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‘‘न्यू इंक’’ यानिकि नई स्याही।
हां हम हैं ‘न्यू इंक’, क्योंकि हम लिखने आए हैं एक नई इबादत अपनी नई स्याही से।
हम करने आए हैं फिर से वही मिशन की पत्रकारिता जो गांधी जी के ‘समाज के
अन्तिम व्यक्ति’ तक पहुंचती हो और उसकी आवाज बन सके। हम करने आए है ‘पत्रकारिता - सत्य और निष्पक्षता के साथ’।



आज भारत सहित पूरे विश्व में पत्रकारिता गुलामी के दौर से गुजर रही है, फिर ये गुलामी चाहे किसी लाभ-हित के लिए हो या मजबूरी के कारण। सबकुछ प्रायोजित है, प्रोपेगेण्डा है। फिर पत्रकारिता कहां है? वह पत्रकारिता जिसने भारत जैसे न जाने कितने देशों को स्वतन्त्रता दिलाने में अहम भूमिका निभायी, देश के लोगों में आत्मसम्मान, स्वाभिमान, राष्ट्रगौरव की भावना का संचार करने का कार्य किया और इन सबसे ऊपर सदैव ‘‘सत्य’’ का साथ पूरी निष्पक्षता के साथ दिया।  आज पत्रकारिता अपने उस मिशन से भटक गयी है या कह लें कि पथभ्रष्ट हो गयी है। पत्रकारिता को उद्योग का दर्जा दिया जा रहा है, मीडिया के महत्व को देखते हुए छोटे-बड़े मीडिया संस्थानों में उद्योगपतियों ने करोड़ों-अरबों का निवेश किया है और जब दुनिया का कोई उद्योग बिना मुनाफे के नहीं चलता तो ‘‘पत्रकारिता उद्योग’’ का मिशन भी आज सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाना हो गया है, फिर यह मुनाफा चाहे सही तरीके से आये या गलत रास्ते से, कोई फर्क नहीं पड़ता ।  ‘‘सत्य और निष्पक्षता’’ का कोई मोल नहीं।  तो क्या सत्य और निष्पक्ष पत्रकारिता का अन्त हो गया है? ऐसा सोचने वालों की तादाद काफी बड़ी है, लेकिन हमारा मानना है कि जब तक इस धरा पर जीवन है, सत्य हमेशा विद्यमान रहेगा और उसकी महत्ता हमेशा सर्वोपरि ही रहेगी। समय-समय पर ‘अधर्म और असत्य’ ने ‘धर्म और सत्य’ को पदच्युत करने की कोशिश की है और भ्रम के मायाजाल में जनमानस में यह स्थापित करने की भी कोशिश की है कि धर्म और सत्य का कोई वजूद नहीं, किन्तु जैसे अमरबेल की लताएं वृक्षों की सूखी टहनियों पर चिपकी हुई सूखी दिखाई पड़ती हैं और जैसे ही वर्षा का जल उनपर गिरता है वे फिर से हरीभरी होकर अपनी लताओं को लम्बी, और लम्बी कर लेती हैं, वैसे ही धर्म और सत्य की न सिर्फ बार-बार विजय होती है वरन उसकी लताएं हर बार लम्बी, और लम्बी होती जाती हैं, और यही भारत सहित सम्पूर्ण विश्व के उस जनमानस का सम्बल है। जो ईमानदार है, परिश्रमी है, और सत्य और धर्म पर विश्वास रखता है।